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Thursday, December 22, 2011
मिल जाएगा प्रेम यहीं...
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at २४ दिसम्बर २०१०
मिल जाएगा प्रेम यहीं...!
मिलते हैं धरती और गगन जहाँ
वह क्षितिज ये नहीं
प्रेम पल्लवित होता है प्रतिपल जहाँ
वह चमन ये नहीं
स्वार्थ के कांटे उग आये हैं यहाँ वहाँ
खो गयी अस्मिता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!
मनुष्यता की सुगंध बिखरी हो जहाँ
वहाँ होते नित उत्पात नहीं
प्रेम बाँध लेता है पल में ही सबको
यहाँ कहीं कोई पक्षपात नहीं
झुक गयी है कमर हौसलों की यहाँ
खो गयी कविता कहीं
आज किसी को किसी से प्रेम नहीं!!!
मिलते मिलते मिल जायेगी मंजिल यहाँ
संभावनाओं की कोई सीमा नहीं
प्रेम अंकुरित होगा स्वाभाविक रूप से
नफ़रत ने कभी मैदान जीता नहीं
खोजते रहने से मिल जायेगी भीतर ही
खो गयी इंसानियत कहीं
मिले वह मिल जाएगा प्रेम यहीं!!!
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