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Friday, December 23, 2011
समय ..
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at १८ दिसम्बर २०१०
समय!
वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!
कब कितने पड़ाव छूटे
कुछ हुए पूरे कुछ सपने टूटे
सारे जोड़ घटाव के बीच
समय ही बलवान रहा!
कितना प्रभु के हैं समीप
कितनी आस्था से जला दीप
आडम्बर के खेल सभी
समय सब पहचान रहा!
बीतते हैं प्रतिपल हम
लिखते हुए हैं आँखें नम
इन आत्मीय उद्गारों में
समय अंतर्ध्यान रहा!
क्या हार क्या जीत
सभी भुलावे के हैं गीत
इनकी कब परवाह उसे
समय गतिमान रहा!
वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा!
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