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Friday, December 23, 2011
सरलता की खोज ..
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at ९ दिसम्बर २०१०
सरलता की खोज!
इस जगत के खेल
सभी निराले हैं!
ऊपर से सब स्वच्छ निर्मल
भीतर से सब काले हैं!
सत्य के मुख पर
जड़े हुए ताले हैं;
हँसना भूल गया है मन
यहाँ सब लोग..
रुलाने वाले है!
आओ सब मिल
खोजें उस सरलता को,
जो अतीत में कहीं
दफन हो गयी!
हमारे भोले-भाले बाल मन की-
कफ़न हो गयी!
नयनो में
कितने सुन्दर सपने पाले हैं!
तब भी अंधकार ही क्यूँ स्पष्ट है
और खोये से उजाले हैं!
प्रसाद के अभाव में
सूनी मंदिर की थालें हैं;
भावविहीन पूजा है
भगवन भी चकित..कहाँ गए वे
जो भक्ति का रूप सजाने वाले हैं!
आओ सब मिल
खोजें उस भावना को,
जो बिछड़ा हुआ
वतन हो गयी!
कब वाष्प बन कर उड़ गयी सरलता-
जमीं रेगिस्तान की तपन हो गयी!!
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ReplyDeleteEach word of yours make me introspect Anu. So Thank you ! in fact ..
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