Thursday, December 22, 2011

नव प्रभात सुखद रहे ..

प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at २९ दिसम्बर २०१०


नव प्रभात सुखद रहे! !


तिथि बदलती है बस
वक्त कहाँ बदलता है
वैसे ही पुराने ढ़र्रे पर
जीवन चलता रहता है!

एक सुबह का आगमन
एक संध्या की विदाई
वही पुराना सिलसिला
चक्रवत चलता रहता है!

सदियों के इस मेले में
एक वर्ष की क्या बिसात
प्रचंड अग्नि की लपटों में
जीवन जलता रहता है!

समय जो बीत रहा है
वह लौट नहीं पाएगा
अंत आखिर होना ही है
दिन ढ़लता रहता है!

बीत रहा जो वर्ष
वह दे जाए आशीष
नव प्रभात सुखद रहे
सपना पलता रहता है!


3 comments:

  1. अनुपमा,
    ३१ दिसम्बर को प्रेषित करेंगे यह सुन्दर रचना ..

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