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Friday, December 23, 2011
कविता कभी ख़त्म नहीं होती ..
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक at १३ दिसम्बर २०१०
कविता कभी ख़त्म नहीं होती...!
अनवरत चलता है
भावों का बहना
जी लिए जाते हैं
अनेकानेक शब्द
अक्षरों के मेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
आते जाते रहते हैं
कई विम्ब
कुछ ठहर कर
ठोस हो जाते हैं
जीवन के खेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
छन छन कर
आज भी आती है चांदनी
देने को कुछ
बेहद सजीव पल
इस रेलमपेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
निश्चित
ज्योत जलेगी
हृदय की बाती
आकंठ है डूबी
भावों के तेल में
इसलिए
शायद
कविता कभी
ख़त्म नहीं होती!
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